1980 के दशक में इरान और इराक के बीच टैंकर युद्ध ने विश्व समुद्री व्यापार को बड़े पैमाने पर बाधित किया था। तब दोनों देशों ने तेल टैंकरों पर मिसाइल और खनन (माइन्स) बिखेर कर एक-दूसरे की शिपिंग लाइनों को निशाना बनाया, जिससे तेल कीमतों में उछाल आया और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा बना। आज के स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ संकट में कई महत्वपूर्ण अंतर हैं। पहला, इरान अकेला नहीं, बल्कि क्षेत्रीय गठबंधनों और वैश्विक महाशक्तियों की जटिल दुविधा का सामना कर रहा है; अमेरिकन वॉरशिप, यूरोपीय नौवहन दल और यूएई‑सऊदी गठबंधन सभी इस जलडमरूमध्य में सक्रिय हैं। दूसरा, तकनीकी प्रगति ने निगरानी और ड्रोन‑आधारित हमलों को आसान बना दिया, जिससे जोखिम का रूप बदल गया है। तीसरा, वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से अधिक विविध हो चुका है; तेल के अलावा गैस और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का महत्व बढ़ा है, इसलिए होर्मुज़ की बाधा का आर्थिक असर अब केवल तेल तक सीमित नहीं। इन बदलावों के कारण, पिछले टैंकर वार की तुलना में आज का संकट अधिक बहुआयामी और जटिल है, जिसका समाधान कूटनीति, समुद्री सुरक्षा सहयोग और ऊर्जा प्रवाह की लचीलापन पर निर्भर करेगा। Post navigation सक्ती के वेदांता प्लांट हादसे में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का कार्रवाई‑आह्वान फरीदाबाद के सेक्टर‑58 में खतरनाक रासायनिक आग, बड़ा हादसा टला