भारत के प्रमुख मेट्रो शहरों में किराए के मकानों का सिक्योरिटी डिपॉजिट बड़ा आर्थिक मुद्दा बनता जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार छह बड़े महानगरों में करीब ₹1.26 लाख करोड़ सुरक्षा राशि के रूप में फंसे हुए हैं। किराए पर घर लेने वालों के लिए यह सबसे बड़ी शुरुआती लागतों में शामिल है। कई मामलों में किरायेदारों को सिक्योरिटी मनी वापस पाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इससे किराए के बाजार में पारदर्शिता और भरोसे पर सवाल उठते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्पष्ट नियमों और बेहतर अनुबंध व्यवस्था की जरूरत है। बढ़ती संपत्ति कीमतों के साथ सिक्योरिटी डिपॉजिट की रकम भी लगातार बढ़ रही है। इससे नौकरीपेशा लोगों, छात्रों और नए शहर में बसने वालों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ता है। कई किरायेदारों को एक साथ किराया, एडवांस और अन्य खर्चों का बोझ उठाना पड़ता है। रेंटल मार्केट में इस मुद्दे पर लंबे समय से चर्चा होती रही है, लेकिन समाधान सीमित रहे हैं। जानकारों का कहना है कि किरायेदारों और मकान मालिकों दोनों के हितों की रक्षा करने वाली व्यवस्था आवश्यक है। सुरक्षित और पारदर्शी रेंटल सिस्टम से विवाद कम किए जा सकते हैं।

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