बिलासपुर के वरिष्ठ साहित्यकार और व्यवसायी द्वारिका प्रसाद अग्रवाल की जिंदगी संघर्ष और सफलता की प्रेरक कहानी है। उन्होंने तीन बार कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को मात दी। बीमारी के कारण उनकी आवाज कमजोर हो गई, लेकिन उन्होंने कलम को अपनी ताकत बना लिया। कभी बोलना उनका पेशा और पहचान थी, लेकिन मुश्किल समय में लेखन ने उन्हें नई राह दिखाई। बचपन से पारिवारिक मिठाई व्यवसाय से जुड़े अग्रवाल ने लंबे समय तक कारोबार संभाला। बाद में वे कॉर्पोरेट ट्रेनर बने और हजारों लोगों को व्यक्तित्व विकास का प्रशिक्षण दिया। वर्ष 2003 में पहली बार उन्हें गाल का कैंसर हुआ। इसके बाद 2008 और 2009 में दोबारा कैंसर का सामना करना पड़ा। लगातार सर्जरी के बाद बोलने में परेशानी हुई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 65 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखकर साहित्य की दुनिया में कदम रखा। वर्ष 2013 में उनकी पहली आत्मकथा ‘न वो समझ सके न हम’ प्रकाशित हुई। इसके बाद उन्होंने कई उपन्यास, यात्रा वृत्तांत और लेख संग्रह लिखे। आज 79 वर्ष की उम्र में भी वे व्यवसाय और लेखन दोनों जारी रखे हुए हैं। उनके सोशल मीडिया पोस्ट और बिलासपुर के इतिहास से जुड़े लेख लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं।

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