1971 के युद्ध में, ईरान ने पाकिस्तान को शरण दी थी। अब, पाकिस्तान ईरानी विमानों को नूर खान एयरबेस पर छिपाने का आरोप लगाया है। इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान संभवतः ईरानी विमानों के चुकाने की प्रयाग का भाग लेता था।

1971 के युद्ध में, ईरान ने सन्तुष्टि और मददकर्ता की रूपरेखा पर अपनी भूमिका निभाई। उस समय, वह देश जुम्मा टोली के आक्रमण के लिए संकल्प रखता था। हालांकि, अब ईरान में विकास और परिवहन की तकनीकी मदद के रूप में युद्ध समय के पश्चात् केले गए अपने एयरबेस हवाई जहाजों पर आरोप लगाने की कोशिश की गई।

इस मुद्दे पर राष्ट्रपति और सरकार के विभिन्न अधिकारियों की ओर से उत्तर आई है। विशेषज्ञों और दलों का मानना है कि पाकिस्तान की अभिप्राय रचनात्मक थी और सहमत रहें। इसके अलावा, मुख्य दलों ने भी आयात पर एक बैठक की सिफारिश की है जो ट्रेड-विवादों में अभ्यास में हुई है।

यह घटना एरियन और पाकिस्तान के बीच की संबंधों पर भारी छावनी डाल सकती है। इसके अलावा, यह संभवतः पश्चिमी महाद्वीप की त्रुटि-परिषद को भी परेशान कर सकता है। अन्य देशों और कंपनियों ने भी इस मुद्दे पर जांच की समय लगवाते हैं।

कर्ज चुकाने की प्रतिक्रिया के अलावा, इस घटना को देश के राजदूतों और अन्तरराष्ट्रीय सम्पर्कों में भी बहुत प्रतिक्रिया दे रहे हैं। विशेषकर, नूर खान एयरबेस के संबंधों में इस घटना पर अधिक प्रश्तुति दी जा रही है।

इसके अलावा, लॉगोफ़ और कंपनियों के बीच संबंध में भी प्रश्तुति दी जा रही है। 1971 के युद्ध के काफी वर्षों तक अनिश्चितता थी, परन्तु आज इसकी छटफट घटना में नूर खान एयरबेस के संबंधों पर भारी प्रभाव हो सकता है।

दूसरी ओर, पाकिस्तान में इस घटना के बाद भी आरंभिक अभियान लगाए जा रहे हैं। सरकार और कंपनियों में सम्मलेंचा हुआ अध्ययन आयात प्रणाली की दृष्टि से पाकिस्तानी विपक्षों की राज्य-राज्य शांति और अनुपार्थित निगमों के लिए महत्वपूर्ण है।

यह घटना देखते हुए, यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान और ईरान के बीच संबंधों में भव्य छटफटा हुआ है। इसके अलावा, यह पश्चिमी महाद्वीप की राष्ट्रीय सहमति और त्रुटि-परिषद को भी प्रभावित कर सकता है।

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