पुर्तगाली लक्ज़री फैशन हाउस प्रादा ने हाल ही में एक नया कदम उठाते हुए, भारत में निर्मित सैंडल लॉन्च किए हैं, जो पिछले साल कंपनी को व्याप्त सांस्कृतिक appropriation (सांस्कृतिक अपहरण) के विवाद के बाद उठाए गए सुधारात्मक उपायों का प्रतीक हैं। पिछले वर्ष, प्रादा ने एक प्रमुख फैशन शो में कुछ सैंडल डिज़ाइन प्रस्तुत किए, जो स्पष्ट रूप से भारतीय पारंपरिक जूते—जैसे ‘जुटी’ और ‘खुशबू’—से प्रेरित थे। हालांकि, इस डिजाइन को पेश करते हुए कंपनी ने इन मौलिक प्रेरणाओं को स्वीकार नहीं किया और न ही किसी भारतीय कारीगर या सांस्कृतिक संस्थान को श्रेय दिया। इस चूक पर विभिन्न सामाजिक समूहों, फैशन आलोचकों और भारतीय हस्तशिल्प समुदायों से तीखी प्रतिक्रिया मिली। कई व्यावसायिक संगठनों ने प्रादा पर भारतीय संस्कृति के प्रति अनादर के आरोप लगाए और सार्वजनिक रूप से माफी माँगने की मांग की। इस प्रतिक्रिया के बाद प्रादा की प्रबंधन टीम ने अपनी गलतियों को स्वीकार किया। कंपनी के मुख्य डिजाइनर और ग्रुप स्नैपशॉट मेनेजर ने एक बयान जारी कर कहा, “हमारी टीम ने अनजाने में एक संवेदनशील मुद्दे को हल्के में लिया। हम भारतीय कला और शिल्प की गहराई को समझते हैं और उसका उचित सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी है।” इन शब्दों के साथ ही प्रादा ने एक ठोस कदम उठाने का निर्णय लिया: वह अब भारत में निर्मित सैंडल पेश करेगा, जिसका उत्पादन पूरी तरह से स्थानीय कारीगरों और सतत् सामग्री से किया जाएगा। इस नई श्रृंखला के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं: 1. **स्थानीय उत्पादन** – सैंडल का विनिर्माण भारत के प्रमुख शिल्प केंद्रों, जैसे फ़ैज़ाबाद, जयपुर और कोलकाता में स्थित छोटे‑बड़े कार्यशालाओं में किया जाएगा। 2. **हस्तशिल्प सहयोग** – प्रादा ने कई पारंपरिक शिल्पकार समूहों, ज्यूट (जूट) बुनाई वाले कारीगरों और बस्त्री उद्योग के विशेषज्ञों के साथ साझेदारी की है, ताकि डिज़ाइन में प्रामाणिक भारतीय मोटिफ और तकनीकों को सम्मिलित किया जा सके। 3. **सतत् सामग्री** – नई सैंडल में ऑर्गेनिक कॉटन, पुनर्नवीनीकरण जूट, बांस और लेदर के वैकल्पिक विकल्प शामिल होंगे, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम रखा जा सके। 4. **सप्लाई चेन पारदर्शिता** – प्रादा ने एक खुली आपूर्ति श्रृंखला ट्रैकिंग प्रणाली स्थापित की है, जिससे उपभोक्ता हर सैंडल के उत्पादन चरण की जाँच कर सके। 5. **सांस्कृतिक मान्यता** – प्रत्येक सैंडल के लेबल में भारतीय शिल्पकार का नाम, उसकी कहानी और उपयोग की गयी पारंपरिक तकनीक का उल्लेख होगा। कंपनी ने इस नई लाइन को “प्रादा इन्डिया” के तहत पेश किया है और इसे विश्व भर के प्रिंटफ़ैशन शैलियों में भारतीय विरासत को सम्मानपूर्वक सम्मिलित करने के प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रादा के एग्जीक्यूटिव ने कहा, “हम चाहते हैं कि हमारे ग्राहक सिर्फ सुंदरता ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्य और नैतिक उत्पादन प्रक्रियाओं को भी अपने साथ ले जाएँ।” उपभोक्ता प्रतिक्रिया अभी शुरुआती चरण में है, परंतु कई भारतीय हस्तशिल्प समूहों ने इस पहल की सराहना की है और इसे “सकारात्मक दिशा में कदम” कहा है। सामाजिक संवाद मंचों पर यह भी चर्चा चल रही है कि क्या यह कदम कंपनी के पिछले गलतियों को पूरी तरह ठीक कर पाएगा या यह केवल एक मार्केटिंग रणनीति है। प्रादा की इस पहल को देखते हुए, अन्य अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों पर भी नज़र टिकी है; उनसे आशा की जा रही है कि वे भी स्थानीय संस्कृतियों का सम्मान करते हुए अपनी रचनात्मक प्रक्रियाओं में वास्तविक सहयोग को प्राथमिकता दें। सारांशतः, प्रादा का भारत में निर्मित सैंडल लॉन्च न केवल पिछले सांस्कृतिक उपेक्षा के प्रति एक क्षमायाचना है, बल्कि एक विस्तृत रणनीति का हिस्सा है, जिसमें स्थानीय कारीगरों को सशक्त बनाना, सतत् सामग्री का उपयोग, और पारदर्शी आपूर्ति श्रृंखला को प्रमुखता दी गई है। इस कदम से भारतीय शिल्प की वैश्विक पहचान को नई ऊँचाई मिल सकती है, बशर्ते कि यह दीर्घकालिक प्रतिबद्धता के रूप में कायम रहे। Post navigation Creating a High-Performance Hindi News Portal छत्तीसगढ़ विधानसभा विशेष सत्र LIVE : दिवंगत नेताओं को श्रद्धांजलि देने के साथ शुरू हुई सदन की कार्यवाही…