पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के मदरसों में ‘वंदे मातरम’ गाना की अनिवार्यता घोषित की. इस फैसले से लोकप्रियता में एक हल्का आंतरिक भाव है, किन्तु राजनीतिक दलों के बीच चर्चा तेज छूट गई है. सरकार ने इसे ‘भारतीय प्रधानमंत्री’ के प्रतिष्ठान की मदद से किया बताया, जो अनुशासन और सूचना के पैटर्न में एक तहराहद बनाने की इस्ताद रखता है. मदरसों के प्रबंधक समिति (Ulama Parishad) के नेता ने यह फैसले की ओर जानकारी दी है, और वे इसकी लाभदायिता में प्रभावित अनुमान कर रहे हैं. वे बताए हैं कि यह फैसला स्कूलों की तुलना में और भी अधिक प्रभावी है, क्योंकि इसे मदरसों की शिक्षा प्रणाली में समाजिक एकता के रूप में समझा जा सकता है. इसके अलावा, बंगाल गवर्नमेंट द्वारा इस फैसले के महत्व की भाषण प्रबंधक समिति के अनुसार, जो ‘वंदे मातरम’ गाने का बोलने के लिए आवश्यकताओं की व्याख्या देता है. सरकार ने इस फैसले को श्रमिक संगठनों और बुनियादी उपलब्धियों की वेतन वृद्धि में प्रवर्तन के रूप में भी आयामित किया है. इसके साथ-साथ, इस फैसले को समझाने के लिए, सरकार के आंदोलन के व्यापक प्रभाव और मदरसों में सामाजिक अंतरित्व की भावना दर्शाने की गई है. इसके समाधान के प्रयास राष्ट्रवाद की मान्यता को बढ़ावा देते हुए, उन्होंने मदरसों की संस्थाओं को ‘भारतीय परम्परा’ और ‘कल्पना’ के संपदा के अविभाजित हिस्से की रूपरेखा दी. बंगाल गवर्नमेंट द्वारा इस फैसले को समझाने में भारतीय प्रधानमंत्री के बुनियादी और शिक्षण पहचान जैसे पैटर्नों का उपयोग भी किया गया है. सरकार ने इस फैसले के महत्व का जोर दिया, और इसे ‘मदरसों में भारतीय संवन्हक रूपांतरण’ के प्रोत्साहन तथा ‘सामाजिक एकता’ के प्रति समर्थन के विचार के नेतृत्व में अंकित किया है. यह फैसले को समझाने के लिए, सरकार के आंदोलन के व्यापक प्रभाव और मदरसों में सामाजिक अंतरित्व की भावना दर्शाने की गई है. इस फैसले के प्रभाव का अध्ययन समाज की एकता और सांसद राष्ट्रवाद की मान्यता को लेकर भी चल रही है. 🔗 Read original source — Aaj Tak Post navigation राज्यसभा चुनाव: कांग्रेस 6 सीटों पर उम्मीद करती है, नए लिए चेहरे भी दिल्ली में पीएम मोदी की अहम मंत्रिपरिषद बैठक, कैबिनेट विस्तार संभव है