सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर मेट्रो रेल डिपो के लिए किए गए भूमि अधिग्रहण को पूरी तरह वैध करार दिया है। अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जिन भूमि मालिकों ने सुनवाई में हिस्सा नहीं लिया, वे बाद में सुनवाई से वंचित रहने का दावा नहीं कर सकते। मामले में भूमि मालिकों ने अधिग्रहण प्रक्रिया के दौरान अपनी आपत्तियां दर्ज कराने में रुचि नहीं दिखाई थी। शीर्ष अदालत ने माना कि अधिकारियों ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत निर्धारित सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया है। सुनवाई के अवसरों का लाभ न उठाना मालिकों की अपनी चूक मानी गई है। कोर्ट ने कहा कि अपनी जिम्मेदारी न निभाने वाले पक्ष बाद में प्रक्रिया में खामी का आरोप नहीं लगा सकते। हालांकि, अदालत ने भूमि मालिकों को राहत देते हुए उन्हें उचित मुआवजा पाने का अधिकार दिया है। यदि मालिक चाहें तो बढ़ी हुई राशि के लिए कानूनी रूप से दावा कर सकते हैं। यह निर्णय भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में एक कड़ा संदेश देता है। यह स्पष्ट करता है कि कानूनी समय-सीमा और सुनवाई के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अधिकारियों को राहत देते हुए कोर्ट ने परियोजना के लिए अधिग्रहित भूमि की प्रक्रिया को सही ठहराया। यह निर्णय भविष्य के भूमि अधिग्रहण विवादों के लिए एक नजीर साबित होगा। Source: Source Post navigation आजम खान की यूनिवर्सिटी के 38 भवनों पर गिरेगी गाज, बिना मंजूरी निर्माण का आरोप छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण पर सख्त कानून लागू, जबरन मतांतरण पर 10 साल जेल और सामूहिक मामलों में उम्रकैद