भारतीय रुपया शुरुआती कारोबार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 22 पैसे मजबूत हुआ। यह सुधार ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के हस्तक्षेप ने घरेलू मुद्रा को स्थिर करने में मदद की। रुपये की मजबूती के बावजूद विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली का दबाव बना हुआ है। कमजोर घरेलू शेयर बाजार ने भी रुपये की बढ़त को सीमित किया। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी का कारण मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव और शिपिंग मार्गों पर जारी संघर्ष बताया जा रहा है। महंगे कच्चे तेल का असर भारत की अर्थव्यवस्था और आयात लागत पर पड़ सकता है। मुद्रा बाजार में निवेशक वैश्विक घटनाक्रम और आरबीआई के कदमों पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार आगे रुपये की दिशा अंतरराष्ट्रीय बाजार और विदेशी पूंजी प्रवाह पर निर्भर करेगी।

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