देश में किफायती घरों का संकट आगे गहरा रह रहा है। इन घरों की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन बाजार में ये वस्तुओं की हिस्सेदारी 26% से घटकर अब सिर्फ 10% रह गई है। इसका कारण, यह स्थिति जो विश्लेषित हुई है, ने पता लगाया है कि साल 2030 तक भारत को 2.5 करोड़ अतिरिक्त सस्ते घरों की आवश्यकता होगी।

2019 से, 4.5 लाख प्रोजेक्ट्स इन घरों की रचना करने में अटके रहे हैं, जिनमें विशेषताओं की दुरुपयोगी प्रणाली और उच्च मूल्य खर्च का रहस्य सबसे अनुकूल होने की तुलना में छूटता है। इन प्रोजेक्ट्स के बाद, विभिन्न सरकारी और संसदीय आचरणों के द्वारा इस समस्या पर ध्यान लगा रहा है।

शिकागो अभ्यासक्रम में शामिल एक विशेषज्ञ की बताई गई संदेश के अनुसार, भारत का समय इस दिक्कत पर मुख्य रूप से ध्यान देना है। वहीं, वहाँ जहां घरों का निर्माण किया जा रहा है, उस प्रक्रिया में सुधार और अभियान शुरू किए गए हैं।

मंत्री महासचिव की संदेश के अनुसार, गृह विकास प्रणाली का सकारात्मक चलाने के लिए योग्यता पर ध्यान दिखलाया जा रहा है। वे ने इस समस्या पर मुख्य बातचीत किए और गृह-विकास अनुसंधान केंद्र जैसी संस्थाओं के साथ कार्यक्रम शुरू किए हैं।

इस विषय पर देखा गया मानना है कि जलवायु परिवर्तन से भी इन घरों के रक्षण में चाहिए। भारत और अन्य देशों के बीच विक्रेता पर सहयोग इस समस्या का हल खोजने में मदद कर सकता है।

भारत की सरकार का उद्देश्य, 2030 तक भारत को प्रति व्यक्ति औसतन 2.5 करोड़ सस्ते घरों की आवश्यकता है। इन अभियानों में शामिल होने वाले विभिन्न अनुसंधान संस्थाएँ, केंद्रीय और राज्य सरकारें और अन्य संगठनों के प्रबल सहयोग का मतलब है।

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