कलकत्ता हाईकोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के तलाक याचिका खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता एक स्वैच्छिक प्रक्रिया है और इसे पक्षकारों पर थोपा नहीं जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनिवार्य मध्यस्थता के लिए दोनों पक्षों की सहमति जरूरी है। आपसी सहमति वाले तलाक मामलों में सुलह की कोशिशों का तरीका विवादित तलाक मामलों से अलग होता है। कोर्ट ने कहा कि जब पति-पत्नी पहले से तलाक के लिए सहमत हैं तो उन्हें जबरन मध्यस्थता के लिए भेजना उचित नहीं है। इस फैसले के बाद संबंधित दंपति की तलाक याचिका पर आगे की सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है। हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में पक्षकारों की इच्छा और सहमति के महत्व पर जोर दिया। फैसले से आपसी सहमति वाले तलाक मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट हुई है। यह निर्णय पारिवारिक विवादों से जुड़े मामलों में मध्यस्थता की भूमिका को लेकर मार्गदर्शन देगा। Source: Source Post navigation रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए 48 घंटे साप्ताहिक ड्यूटी और छुट्टी की मांग, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई जनहित याचिका 9 साल से जेल में बंद कैदी की अपील में देरी पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट सख्त, लीगल एड वकील हटाया गया