छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि विवाहित बेटियों को भी अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने बैंक के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें महिला का आवेदन केवल उसके विवाहित होने के आधार पर खारिज किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आश्रित होने का निर्धारण केवल वैवाहिक स्थिति से नहीं किया जा सकता। यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। न्यायालय ने कहा कि विवाह के बाद भी बेटी का अपने मायके से संबंध समाप्त नहीं होता। इसलिए केवल शादीशुदा होने के कारण उसे अधिकारों से वंचित करना उचित नहीं है। अदालत ने समानता के संवैधानिक सिद्धांतों पर जोर दिया। फैसले में परिवार की बदलती सामाजिक परिभाषा को भी महत्व दिया गया। न्यायालय ने कहा कि कानून का उद्देश्य वास्तविक आश्रितों को राहत देना है। यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। हाईकोर्ट का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के समानता संबंधी पूर्व निर्णयों के अनुरूप है। Source: Source Post navigation आवारा कुत्तों और मवेशियों के प्रबंधन पर हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार से 22 सितंबर तक मांगी प्रगति रिपोर्ट आवारा कुत्तों के हमलों पर हाईकोर्ट सख्त, कहा- योजनाओं के साथ लगातार निगरानी भी जरूरी