1980 के दशक में भारत में उन्नत औद्योगिक उपकरणों के निर्माण को लेकर कई तरह की धारणाएं थीं। इसी दौर में पंजाब के इंजीनियर प्रीतम सिंह मोगेवाला ने एक चुनौती स्वीकार की। डैशमेश इंजीनियरिंग से जुड़े मोगेवाला ने Hero Honda के लिए एक विशेष फिक्स्चर विकसित किया। बताया जाता है कि उस समय इंजीनियरों का मानना था कि यह उपकरण भारत में नहीं बनाया जा सकता। मोगेवाला ने व्यावहारिक सोच और तकनीकी कौशल के दम पर इस धारणा को चुनौती दी। इस काम में बेंगलुरु के इंजीनियर बी.के. जैन के साथ उनकी महत्वपूर्ण साझेदारी रही। दोनों ने आयात पर निर्भरता के बजाय स्वदेशी इंजीनियरिंग को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उनकी कहानी तकनीकी चुनौतियों के समाधान के लिए दृढ़ता और आत्मविश्वास की मिसाल बन गई। वर्षों बाद जर्मनी के एक रेलवे स्टेशन पर हुई मुलाकात ने इस कहानी को फिर चर्चा में ला दिया। इस अनुभव से यह संदेश मिलता है कि जटिल तकनीकी समस्याओं का समाधान देश में ही विकसित किया जा सकता है। मोगेवाला और जैन की यात्रा छात्रों के लिए नवाचार, लगन और आत्मविश्वास की प्रेरक मिसाल है। उनकी उपलब्धि ने भारतीय इंजीनियरिंग क्षमता में विश्वास को मजबूत करने में योगदान दिया। Source: Source Post navigation 1857 के जख्मों की यादों के बीच रोहनत गांव में आजादी के 71 साल बाद फहरा तिरंगा भारत में बढ़ रहा अंग प्रत्यारोपण संकट, हर साल 2 लाख नए किडनी मरीज; सिर्फ 14,500 ट्रांसप्लांट