जेलों में खून-खराबे की लहर देखी जा रही है, जहाँ कैदियों में एक-दूसरे को दर्द पहुँचाने की हिम्मत पनप रही है। क्या यह डरावनी संस्कृति, जहाँ बंदी एक-दूसरे को डराते और वेदी के रूप में इस्तेमाल होते हैं, अब सामान्य हो गई है? विशेषज्ञों का मानना है कि जेलों में भय की यह गहरी जड़ें, सख्त सुरक्षा उपायों के बावजूद, अपराधियों को ठंडे खून से हमला करने के लिए प्रेरित करती हैं। जेलों में प्रचलित यह ‘इंटिमिडेशन’ की परिपाटी, नई पीढ़ी के कैदियों को भी इस बिनैतिकता में फँसाती है। सामाजिक पुनर्वास की कमी और मानवीय दृष्टिकोण में गिरावट ने इस बुरी प्रवृत्ति को फलने-फूलने दिया है। रिपोर्टें दर्शाती हैं कि इन हत्याओं को रोकने के लिये न केवल कड़ी सजा, बल्कि जेलों में सकारात्मक माहौल, मनोवैज्ञानिक सहायता और पुनर्संरचना कार्यक्रमों की सख्त जरूरत है, ताकि यह अंधेरा दौर जल्द खत्म हो सके। Post navigation स्पर्स और वेस्ट हैम पर सबका ध्यान? फ़ॉरेस्ट की अद्भुत जीत से बचाव की राह पर ट्रम्प के प्रतिनिधि विटकोफ़ और कुस्नर पाकिस्तान जा रहे हैं इरान वार्ताओं के लिए