दिल्ली हाई कोर्ट की सेवानिवृत्त जज पूनम ए बांबा ने न्यायिक व्यवस्था की जटिल गतिशीलता पर प्रकाश डाला है। उन्होंने कहा कि जजों को कई मामलों और दस्तावेजों के ढेर के बीच काम करते हुए भारी दबाव का सामना करना पड़ता है। बांबा ने अदालत के स्टेनोग्राफर और पुलिस अधिकारियों जैसे कर्मचारियों की महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली भूमिकाओं को भी स्वीकार किया। उन्होंने मुकदमों के दौरान जजों पर पड़ने वाले भावनात्मक बोझ को भी रेखांकित किया। उन्होंने नागरिकों से अपनी कानूनी स्थिति के बारे में सक्रिय रूप से मार्गदर्शन लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि अदालतों में रोजाना करीब 125 मामले आते हैं और हजारों दस्तावेज तथा घंटों की सुनवाई होती है। न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जनभागीदारी जरूरी है।

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