दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि बच्चे को माता-पिता में से किसी एक से मिलने के लिए उसकी इच्छा के विरुद्ध मजबूर नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने 7 अक्टूबर 2026 को पारित आदेश में यह टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट के निर्देशों के तहत मां द्वारा बच्चे को पेश करना अपने आप में आदेश का पालन माना जाएगा। केवल इसलिए जानबूझकर अवज्ञा नहीं मानी जा सकती कि मुलाकात पिता की अपेक्षा के अनुरूप नहीं हुई। मामला बच्चे की कस्टडी व्यवस्था और माता-पिता के बीच मुलाकात से जुड़ा था। याचिकाकर्ता इशु शौरी ने मेघा वर्मा के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की थी। याचिका में अदालत के आदेशों का पालन नहीं किए जाने का आरोप लगाया गया था। यह याचिका अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(बी), 10 और 12 के साथ संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत दाखिल की गई थी। अदालत ने मामले में यह देखा कि क्या फैमिली कोर्ट के निर्देशों की जानबूझकर अवहेलना की गई थी। बच्चे को अदालत के निर्देशानुसार पेश किए जाने के तथ्य को महत्वपूर्ण माना गया। अदालत ने कहा कि मुलाकात का अपेक्षित परिणाम न मिलना अपने आप में अवमानना साबित नहीं करता। इस आधार पर अदालत ने अवमानना की कार्यवाही आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही याचिका का निपटारा कर दिया गया। Source: Source Post navigation अंबाला शराब तस्करी केस में रोहतक के लॉ स्टूडेंट को जमानत, कोर्ट बोली- तस्करों से सीधे जुड़ाव के सबूत नहीं