पीजी कॉलेज कवर्धा में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘वैश्वीकरण का बहुआयामी प्रभाव: विश्व व्यापार और संस्कृति विषय’ का समापन हुआ। अकादमिक गरिमा, शोधपरक प्रस्तुतियों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट् रीय विद्वानों की सक्रिय भागीदारी ने इस आयोजन को जिले के बौद्धिक परिदृश्य में एक विशेष पहचान दिलाई। समापन सत्र की अध्यक्षता कॉलेज की प्राचार्य डॉ. ऋचा मिश्रा ने की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अकादमिक आयोजन विद्यार्थियों में शोध की प्रवृत्ति विकसित करने के साथ उन्हें वैश्विक चिंतन और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनते हैं। संगोष्ठी में वैश्वीकरण के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक प्रभावों पर व्यापक चर्चा और शोध मंथन किया गया। कार्यक्रम में ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों माध्यमों से विद्वानों, प्रतिभागियों की सक्रिय सहभागिता रही। ऑनलाइन माध्यम से चीन की यूलिन यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संतोष कुमार वर्मा ने हाइड्रोजन स्टोरेज तकनीक पर अपना शोध प्रस्तुत करते हुए कहा कि भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में हाइड्रोजन आधारित तकनीक विश्व अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दिशा बदल सकती है। उन्होंने इसे ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण बताया। शासकीय कॉलेज उतई (दुर्ग) के शिक्षाविद प्रो.डॉ. सियाराम शर्मा ने एलपीजी नीतियों और बाजारवाद पर अपने विचार रखते हुए कहा कि वैश्वीकरण ने व्यापार को गति दी है, लेकिन सामाजिक असमानता और बेरोजगारी जैसी चुनौतियां भी बढ़ी हैं। उन्होंने भारत की मिश्रित अर्थव्यवस्था को संतुलित और सर्वश्रेष्ठ मॉडल बताते हुए सामाजिक न्याय एवं आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता बताई। मध्य प्रदेश से आए डॉ. अजय कुमार राय ने कहा कि वैश्वीकरण केवल आर्थिक बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने विश्व की संस्कृतियों, सामाजिक मूल्यों और जीवनशैली को भी गहराई से प्रभावित किया है। आयोजन समिति की भूमिका रही अहम संगोष्ठी के आयोजन सचिव प्रो.मुकेश कुमार कांबले ने संपूर्ण कार्यक्रम के संचालन, शोध सत्रों के समन्वय और प्रतिभागियों के बीच अकादमिक संवाद को सुचारु बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं, संयोजक प्रो. नरेंद्र कुमार कुलमित्र ने विषय चयन, कार्यक्रम की रूपरेखा और विभिन्न गतिविधियों के समन्वयन में विशेष योगदान दिया। संगोष्ठी में वैश्वीकरण के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक प्रभावों पर व्यापक चर्चा और शोध मंथन किया गया। इसे ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण बताया। समानांतर तकनीकी सत्रों में कॉलेज के प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। इनमें डॉ. कविता कनौजे, डॉ. अगर दास बघेल, मनसुख लाल वर्मा, आशीष श्रीवास्तव, किरण कोठारी, ऋतु चंद्राकर और डॉ. देवराज वर्मा सहित युवा शोधार्थी लोकेश्वर साहू, खुशी परिमल और भूमिका देवांगन की प्रस्तुतियों ने विशेष ध्यान आकर्षित किया।

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