भारत फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के लिए एक बड़े सरकारी समझौते के करीब पहुंच गया है। इस सौदे की अनुमानित लागत लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। प्रस्तावित समझौते के तहत 18 विमान सीधे तैयार अवस्था में भारत को मिलेंगे। शेष 96 विमानों का निर्माण भारत में किया जाएगा, जिससे रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा। इस खरीद का मुख्य उद्देश्य भारतीय वायुसेना की घटती स्क्वाड्रन क्षमता को मजबूत करना है। वर्तमान में वायुसेना को आवश्यक संख्या की तुलना में कम लड़ाकू स्क्वाड्रनों के साथ काम करना पड़ रहा है। राफेल विमानों के शामिल होने से परिचालन क्षमता और मारक शक्ति में वृद्धि होने की उम्मीद है। ये विमान आधुनिक हथियार प्रणालियों और उन्नत तकनीकों से लैस हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आयातित विमानों पर निर्भरता दीर्घकालिक समाधान नहीं है। स्वदेशी परियोजनाएं जैसे तेजस Mk2 और एएमसीए भविष्य की सुरक्षा जरूरतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन कार्यक्रमों से भारत की आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता को मजबूती मिलेगी। बदलते क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा खतरों के बीच आधुनिक लड़ाकू बेड़े का विस्तार आवश्यक माना जा रहा है। राफेल सौदा तत्काल जरूरतों को पूरा कर सकता है, लेकिन दीर्घकालिक रणनीति में स्वदेशी विकास की भूमिका निर्णायक रहेगी।

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