इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने ‘बुलडोजर न्याय’ को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायाधीश ने कहा कि ऐसी कार्रवाई समाज में प्रतिशोध की भावना को बढ़ावा दे सकती है। उन्होंने सुझाव दिया कि FIR दर्ज होने और बुलडोजर कार्रवाई के बीच दो साल का अंतर रखा जाना चाहिए। हालांकि, अदालत के विभाजित फैसले के कारण यह सुझाव अभी कानून नहीं बना है। मामले में पीठ के दोनों न्यायाधीशों की राय अलग-अलग रही। इस वजह से अंतिम कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। टिप्पणी ने संपत्ति तोड़ने की प्रशासनिक कार्रवाई पर नई बहस शुरू कर दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, दोष सिद्ध होने से पहले कठोर कार्रवाई को लेकर कानूनी सवाल उठते रहे हैं। अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों के महत्व पर जोर दिया। इस मुद्दे पर आगे उच्च न्यायिक समीक्षा की संभावना बनी हुई है।

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