कलकत्ता हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि अलगाव के बाद पति-पत्नी का दोबारा साथ रहना पहले की क्रूरता को अपने आप माफ नहीं करता। कोर्ट के अनुसार, कभी-कभार साथ रहने की घटनाओं को पुराने वैवाहिक अपराधों की माफी नहीं माना जा सकता। अदालत ने मानसिक क्रूरता के आधार पर फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए तलाक को बरकरार रखा। पीठ ने कहा कि गंभीर और निराधार आरोप लगाना भी मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है। पत्नी ने फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। डिवीजन बेंच ने पत्नी की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने मामले में पति के खिलाफ लगाए गए आरोपों और वैवाहिक परिस्थितियों पर भी विचार किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि साथ रहने के कुछ अवसर पुराने आचरण को स्वतः समाप्त नहीं करते। मानसिक क्रूरता का आकलन पूरे वैवाहिक व्यवहार और परिस्थितियों के आधार पर किया जा सकता है। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इस फैसले में वैवाहिक संबंधों में क्रूरता और उसके बाद साथ रहने के कानूनी प्रभाव को स्पष्ट किया गया है। Source: Source Post navigation मिजोरम मैरिज एक्ट में संशोधन को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से हाईकोर्ट जाने को कहा कैथल में युवक की हत्या के मामले में पांच दोषियों को उम्रकैद, प्रत्येक पर 2.42 लाख रुपये जुर्माना