एमपी के ग्वालियर के एक निजी चिकित्सालय में 8 महीने के शिशु की उल्टी की शिकायत पर भर्ती करके उपचार शुरू किया गया। लेकिन दो दिनों के भीतर शिशु की तबियत बिगड़ती गई और अंतिम चरण में डॉक्टरों ने उसे इंटुबैशन दिया, फिर भी बच्चा नज़रबंद रह गया। परिवार ने बताया कि डॉक्टरों ने प्रारम्भिक जांच में खांती को हल्का समझा और आवश्यक जाँच‑जांच में देरी की। मृत्यू के बाद परिवार ने अस्पताल पर आरोप लगाया कि उपचार में लापरवाही और रोगी की निगरानी में कई चूकें हुईं। मेडिकल बोर्ड ने केस दर्ज किया, जबकि अस्पताल ने कहा कि उन्होंने सभी जरूरी प्रोटोकॉल अपनाए थे। इस घटना ने निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में बच्चों के उपचार मानकों पर प्रश्नचिह्न लगा दिया, और अधिकारियों से अधिक पारदर्शी जांच और जवाबदेही की मांग की जा रही है। Post navigation दुर्ग में जर्दा युक्त गुटका फैक्ट्री पर छापा: मुसाफिर ब्रांड की उत्पादन लाइन नष्ट राजस्थान समाचार: नारकोटिक्स ब्यूरो ने 938 किलोग्राम डोडा चूरा जब्त किया, 3 तस्कर हिरासत में